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कलमक्रान्ति

अपने आजाद विचार,व्यंग्य या सुझाव रखने के लिए इस ब्लॉग पर मुझे या आपको कोई मनाही नहीं है
-कलमक्रान्ति

Tuesday, April 8, 2014

वाकई राजनीति बदल गयी है !!!

माला पहनाई और रख दिया एक.............
वो सच ही कह रहे थे कि "हम राजनीती करने नहीं , इसे बदलने आये है" वाकई राजनीति तो बदल दी इन्होने वर्ना कभी न देखा था किसी पार्टी के अध्यक्ष को 20 दिनों के अंदर 5 बार भीड़ में थप्पड़ खाते हुए ,या किसी S.H.O. द्वारा राज्य के कानून मंत्री को औकात में रहने की हिदायत देते हुए। हाँ हमने देखा था काशीराम जी को एक पत्रकार पर हाथ उठाते हुए ,हमने देखा था अफसरों को मंत्रियों के जूते साफ़ करते हुए पर पब्लिक से थप्पड़ या जूते खाने का मौका तो नेताजी को जीवन में सिर्फ एक ही बार मिलता था ,चाहे हुड्डा साब हो या चिदम्बरम जी ,मुझे तो याद नहीं कि अरविन्द से पहले किसी भी नेता पर इतने हमले हुए हो।  
चुनावी आचार संहिता लागु होने के दिन ही इतना ज्यादा उपद्रव हुआ था तो प्रचार के दौरान ऐसे थप्पड़ मुक्के चलना स्वाभाविक ही था परन्तु गौर करने लायक बात ये है कि सारे हमले सिर्फ एक ही लीडर पर हुए और वजह दी गयी वादे पूरे न करना,
इस देश के वोटर ऐसे तो कभी नहीं थे ,वर्ना वादों के नाम पर अगर थप्पड़ बरसते तो अपने सारे सांसदों और विधायकों के गालों पर आज अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लोगों की दी हुई निशानियाँ होती। इस सब के पीछे चाहे कोई राजनीतिक साजिश हो या कोई और वजह, पर है तो ये एक तरह कि कायरता ही, जब हमारा संविधान हमें खुद हमारा नेता चुनने का हक़ देता है तो चुनाव से पहले ऐसी हिंसा शर्मनाक है।

ये स्याही ,अंडे और थप्पड़  का कल्चर हमारे हिंदुस्तान का नहीं है,लोकतंत्र को इस तरह की घटिया हरकतों के जरिये शर्मसार न किया जाए। 

Wednesday, April 2, 2014

धुंए में उड़ती जिन्दगी

आज कॉलेज से हॉस्टल आते वक्त पैरों में रहे सड़क पर पड़े कचरे पर नज़र डाली तो अधबुझी सिगरेट और उनके खाली पैकेट्स के अलावा कोई इक्का दुक्का ही अलग कचरा दिखा होगा। गौर से देखा तो पैकेट के ऊपरी भाग में ब्रांड के नाम के बाद शेष बचे दो तिहाई भाग में काले हुए फेंफड़े और गला दिखाया गया था और भविष्य में कैंसर के खतरे से आगाह भी किया गया था , तक़रीबन 6 फुट ऊपर से भी मेरा चश्मा सड़क पर पड़े इस पैकेट पर लिखी कैंसर की चेतावनी दिखा रहा था, पता नहीं इसे इस्तेमाल करने वाले कैसे इसे नजरअंदाज कर देते है।  
कॉलेज में तो टोबैको फ्री कैंपस के बोर्ड लगे है जिनकी प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं है पर कैंपस की चारदीवारी से दो कदम बाहर जो रखे तो अपनी जवानी और भविष्य को सिगरेट के धुंए में उड़ाते हुए वो ब्रांडेड टीशर्ट पहने कानों में इयरफ़ोन डाले 'कूल ड्यूड्स' दिखाई देते है जिनको इस बात का कोई इल्म ही नहीं है कि घर से रोज़ फ़ोन करने वाली उनकी माँ को आज भी ये लगता है कि उसका बेटा  आज भी एल्पेनलिब्बेल खाता है और फ्रूटी पीता  है। 

खैर समाज बदल रहा है, बदलते समाज में जहां एक ओर ये जवान लड़के लडकियां भ्रष्टाचार ,गुंडागर्दी या दहेज़ जैसी रूढ़िवादी परम्पराओं के खिलाफ आवाज उठा रहे है वहीँ एक सच ये भी है कि इनके लिए सिगरेट शराब जैसी चीज़ें फैशन बन गयी है। 

अपने विचारों को व्यक्त करने में अगर यहाँ मैंने किसी व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है तो इसके लिए मुझे कोई खेद नहीं है क्योंकि मैं नहीं समझता कि सिगरेट के कश में अपनी जिंदगी उड़ाना किसी समस्या का समाधान है या किसी तरह का फैशन स्टेटमेंट है।    


अंत में गुलजार साहब की दो पंक्तियाँ
"मैं सिगरेट तो नहीं पीता पर हर आने वाले से ये पूछ लेता हूँ - माचिस है क्या?
मैं सिगरेट तो नहीं पीता पर हर आने वाले से ये पूछ लेता हूँ - माचिस है क्या?
क्यूंकी ऐसा बहुत कुछ है जिसे मैं जला देना चाहता हूँ "

Wednesday, March 5, 2014

चुनावी आगाज - पत्थरो और लाठियों के साथ

चुनावी आचार संहिता आज लागू ही हुई थी कि कहीं पर किसी को गिरफ्तार कर लिया , कहीं प्रदर्शन कहीं पत्थराव , वजह जो भी हो इस सब के पीछे पर इज्जत तो इस लोकतंत्र की ही लूटी गयी। कुर्सियां और पत्थर उछाले जा रहे है , किसी का सर फोड़ दिया किसी को लाठियों से पीटा  गया।  टीवी डिबेट्स में बैठकर अपनी अपनी पार्टी को दूध की धुली  बता कर सामने वालो पर भर भर के कीचड़ उछाला  जा रहा है।
 क्या दुर्भाग्य आ गया है इस देश का , दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की गरिमा की धज्जियां उड़ाई जा रही है , और ऐसा करने वाले कोई और नहीं बल्कि खुद वो ढोंगी लोग है जिन्होंने कभी बड़ी ही बुलंद आवाज़ों में इस लोकतंत्र की गरिमा बनाये रखने की शपथ ली थी। कुछ ही दिन पहले की बात है तेलंगाना मुद्दे पर एक महाशय ने मिर्ची स्प्रे छिड़क दिया ,किसी ने माइक तोड़ दिया , हद तो तब हो गयी जब उत्तरप्रदेश विधानसभा में दो महोदय निर्वस्त्र हो गए और  अभी कुछ दिन पहले कानपुर में एक विधायक और उनके साथियों ने मेडिकल कॉलेज के छात्रों को हॉस्टल में घुस कर मारा।
चंद वोटो के खातिर उपद्रव मचाने वाले इन नेताओं को इतने दिन से इग्नोर कर रहा था पर आज ये उंगलियां अपने आप कलमक्रांति पर टाइप करने लगी ,जब घरवालो ने फ़ोन करके मुझे ये बोला कि" बेटा हॉस्टल से बाहर जाए तो ध्यान रखना ,कोशिश करना कि जाने की जरुरत ना ही पड़े ,ये ख़बरों में दिखा रहे है कि केजरीवाल की गाडी पर हमला हुआ है और दिल्ली लखनऊ में भी ये लोग आपस में लड़ रहे है "
तो अब हालत ये हो गयी है कि घरवालो को ये चिंता रहती है कि उनका लड़का राजनीती के इस घटिया रूप की चपेट में ना आ जाए। 
सोशल मीडिया पर भी नमो और अरविन्द के चेले अपने अपने गुरुओं के बचाव में अंधाधुंध स्टेटस और फोटोज दागने में लगे है ,और इसी जद्दोजहद में अपनी भाषा और संयम को राजनीती से भी नीचे गिरा दिया इन अंधे भक्तों ने। 
इन फूल ,पंजे, झाड़ू और साइकिल वालों ने उस तिरंगे और संसद को शर्मसार कर दिया है।  


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