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-कलमक्रान्ति
Friday, September 1, 2017
Thursday, August 31, 2017
विपक्ष कहाँ है ?
गोरखपुर में नन्हे बच्चे प्रशासन की लापरवाही की बलि चढ़ गए है , हरियाणा में सरकार के सुरक्षा इंतज़ाम आश्वासन के बावजूद 38 लोग भीड़ में छुपे गुंडों के हाथो मारे गए , रेलगाड़ियाँ पटरियों से उतर रही है, दंगे हो रहे है .........अराजकता तो नहीं है ,सरकारें है हमारे पास ...... लेकिन जवाबदेही कहाँ है..... सवाल पूछने वाला विपक्ष कहाँ है ?
लोकतंत्र में सरकार का जितना महत्व है उतना ही विपक्ष का , लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए ही विपक्ष का अस्तित्व है।
हाँ ये सच है संसद में विपक्ष के पास सरकार की किसी नीति को अस्वीकार करने लायक आंकड़े नहीं है , लेकिन संसद एक मंच भी प्रदान करता है देश के नागरिको तक अपनी बात पहुंचाने के लिए , किसी नीति पर सरकार के समानांतर या विपरीत एक पक्ष रखने के लिए, जाहिर है की विपक्ष अपनी ये जिम्मेदारी भी भूल गया है।
संसद में पक्ष रखने के लिए वहां हाजिर रहना पड़ता है और बीते सालो में सांसदों की संसद में गैरहाजरी तो पहले से ही विचारणीय बिंदु रहा है। अगर संसद में नहीं तो संसद के बाहर ही सही , लेकिन विपक्ष तो वहां भी नहीं है। संविधान बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार इसलिए भी देता है की बिना किसी दबाव के सरकार के काम की प्रशंसा या निंदा की जा सके।
अगर यही हाल रहा तो डर है की हमारा लोकतंत्र भी एक कागजी लोकतंत्र बनकर रह जाएगा जिसमे सरकारे चुन के तो लोगो में से आएगी पर अपनी गलतियों के लिए लोगो के प्रति उनकी जवाबदेही कहीं नहीं होगी।
लोकतंत्र में सरकार का जितना महत्व है उतना ही विपक्ष का , लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए ही विपक्ष का अस्तित्व है।
हाँ ये सच है संसद में विपक्ष के पास सरकार की किसी नीति को अस्वीकार करने लायक आंकड़े नहीं है , लेकिन संसद एक मंच भी प्रदान करता है देश के नागरिको तक अपनी बात पहुंचाने के लिए , किसी नीति पर सरकार के समानांतर या विपरीत एक पक्ष रखने के लिए, जाहिर है की विपक्ष अपनी ये जिम्मेदारी भी भूल गया है।
संसद में पक्ष रखने के लिए वहां हाजिर रहना पड़ता है और बीते सालो में सांसदों की संसद में गैरहाजरी तो पहले से ही विचारणीय बिंदु रहा है। अगर संसद में नहीं तो संसद के बाहर ही सही , लेकिन विपक्ष तो वहां भी नहीं है। संविधान बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार इसलिए भी देता है की बिना किसी दबाव के सरकार के काम की प्रशंसा या निंदा की जा सके।
अगर यही हाल रहा तो डर है की हमारा लोकतंत्र भी एक कागजी लोकतंत्र बनकर रह जाएगा जिसमे सरकारे चुन के तो लोगो में से आएगी पर अपनी गलतियों के लिए लोगो के प्रति उनकी जवाबदेही कहीं नहीं होगी।
Friday, January 23, 2015
सियासत फिर जीत गयी, आंदोलन हार गया...
जे पी की तरह अन्ना के भी सभी चेलों का प्लेसमेंट हो गया ( FYI : प्लेसमेंट हमारी इंजीनियरिंग के फर्स्ट ईयर और फोर्थ ईयर में सबसे ज्यादा प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द है ),
ताज़ा प्लेसमेंट किरण बेदी जी का हुआ है। अन्ना के इंडिया अगेंस्ट करप्शन के 2011 बैच के श्रेष्ठतम विद्यार्थियों में से एक किरण जी का अचानक ह्रदय परिवर्तन हुआ, नतीजतन वो अभी भाजपा में प्लेस हुई है , वैसे अरविन्द , वी के सिंह , विश्वास ,सिसोदिया ,शाजिया जैसे होनहारों का प्लेसमेंट तो काफी पहले हो ही गया था। कोई झाड़ू तो कोई कमल वाली कंपनी में प्लेसमेंट करवा के उम्मीदों के बड़े भारी पैकेज लेकर बैठा है।
तक़रीबन 40 साल पहले 1974 में जयप्रकाश नारायण (जे पी ) के पूर्ण स्वराज आंदोलन से निकले लालू यादव , नीतीश कुमार ,रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं को सियासत में अपने पैर जमाने में इतना समय लग गया जब कि ट्वेंटी ट्वेंटी के इस दौर जिस फुर्ती से अन्ना के चेलों ने रन बटोरे है उसका अंदाजा तो इसी से लगता है कि राजधानी में चुनाव कोई भी जीते , मुख्यमंत्री अन्ना के ही चेलों में से ही कोई होगा।
भले ही अरविन्द सबसे ईमानदार नेता हो , भले ही किरण सबसे अच्छी मुख्यमंत्री साबित हो लेकिन जब अरविन्द बोलते है कि हमसे गलती हो गयी , किरण बेदी या शाज़िआ सरीखे लोगो के अचानक हृदय परिवर्तन हो जाते है, सब आपस में आरोप प्रत्यारोप करते है तो बार बार ये ख्याल आता है की एक बार फिर राजनीति जीत गयी ,आंदोलन हार गया। 4 साल पहले जंतर मंतर पर जो उम्मीद जगी थी ,उसकी धज्जिया उड़ती दिखती है।
अरविन्द , किरण, सिसोदिया या शाज़िआ तो अभी भी सुर्ख़ियों में है , पर अन्ना और उनका लोकपाल सब भूल गए है। सब एक दूसरे के पुराने ट्वीट्स और बयान निकाल कर ला रहे है ,पता नहीं पुराने उसूलों पर कब ध्यान जाएगा।
खैर जो भी हो , एक बात ये भी है कि दिल्ली के लोगो के पास मुख्यमंत्री के लिए इनसे अच्छे विकल्प नहीं हो सकते थे।
" सियासत फिर जीत गयी,
आंदोलन पुनः हार गया,
कुर्सी का वो कीड़ा
उसूलों को डकार गया
तब जेपी हारा था अब अन्ना हारा है
राजनीति के इस जंगल में
आज भी लोकतंत्र ही बेचारा है "
Tuesday, December 30, 2014
धर्म के ठेकेदार
देश में ये हो क्या रहा है?
लव जिहाद की पागलपन्ति अभी थमी ही थी कि धर्मांतरण व घर वापसी जैसे मुद्दे महंगाई और अर्थव्यवस्था की चर्चाओं पर हावी हो गए।
जिस आग से आर एस एस , वि एच पि और बजरंग दल खेल रहे है उसके खतरों से शायद वो खुद वाकिफ नहीं है , आज ही के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में खबर छपी है कि यूपी के ढांगर समुदाय के लोगो ने सरकार को ये धमकी दी है कि उन्हें शिड्यूल्ड कास्ट के सर्टिफिकेट जारी किये जाए वर्ना ढांगर समुदाय के 1.2 लाख लोग ईसाई धर्म अपना लेंगे , ये आर एस एस और वी एच पी जैसे हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की ही लगाईं आग का नतीजा है कि कोई भी मुंह उठाकर चला आ रहा और लाखो की तादात में धर्मांतरण की धमकियां दे रहा है। इस देश में जब साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ जैसे लोग संसद में पहुँच गए है तो धर्म के नाम पर ऐसी धमकियां मिलने की ही कमी बाकी रह गयी थी ,जो कि आज ये ढांगर समुदाय पूरी कर रहा है। कल कोई फलाँ जाति आएगी और परसों कोई ढिमका सम्प्रदाय,निजी फायदे और वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की विविधता को यूँ ही हाशिये पर धकेल दिया जाएगा और सेकुलरिज्म की धज्जियाँ उड़ा दी जायेगी ।
बिहार में कुछ सालों पहले धर्म परिवर्तन करके हिन्दू से ईसाई बने लोगो को धमकियां मिल रही है। तोगड़िया बोल रहे है देश को शत प्रतिशत हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे ,बजरंग दल वाले मूवी थिएटर्स में उत्पात मचा रहे है। इन सब को देख कर लग तो यही रहा है कि हिन्दू धर्म की रक्षा का पूरा ठेका इन्ही को मिला है।
नाथूराम गोडसे को बीजेपी के ही एक सांसद सरेआम देशभक्त बोल रहे है , कुछ सिरफिरे गोडसे की मूर्तियां बना कर बैठे है और मंदिर बनवाने की बात कर रहे है। कुछ महीने पहले आर एस एस की ही एक पत्रिका में छपे लेख में कहा गया की गोडसे को गांधी की बजाय नेहरू को मार देना चाहिए था। क्या ऐसे बयानों और लेखों को बिना किसी कार्यवाही के नजरअंदाज कर देना गांधी नेहरू जैसे उन तमाम देशभक्तों का अपमान नहीं है जिन्होंने इस देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
मेक इन इंडिया ,स्वच्छ भारत अभियान और मन की बात जैसे सरकार के कदम काबिले तारीफ़ है पर क्या गोडसे , संघ और धर्म के ठेकेदारों पर सरकार कुछ ज्यादा ही मेहरबान नहीं हो रही ? 125 करोड भारतीयों ने मिलकर इस सरकार और प्रधानमन्त्री को चुना है न कि किसी आर एस एस या वी एच पी ने। धर्म के इन ठेकेदारों पर अगर अभी नकेल नहीं कसी गयी तो भविष्य में ये इस देश और सरकार दोनों को ले डूबेंगे---
लम्हों ने खता की है , सदियों ने सजा पाई है।
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