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कलमक्रान्ति

अपने आजाद विचार,व्यंग्य या सुझाव रखने के लिए इस ब्लॉग पर मुझे या आपको कोई मनाही नहीं है
-कलमक्रान्ति

Friday, August 14, 2020

आजादी?

 "ये दाग दाग उजाला ये शब-गज़ीदा सहर,

वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं"

फ़ैज़ साहब ने ये नज़्म लिखी थी, 1947 में ।
आजादी को फ़ैज़ ऐसे परिवर्तन के रूप में 
देखना चाहते थे,
जो अमीरों - गरीबों के फासले कम कर देगी, 
मुल्क में खुशहाली लाएगी।
पर बंटवारा और दंगों में 
अपने ख्वाबों के मुल्क को जलता देख कर ही
 ये सच उन्होंने लिख डाला।

"Happy independence day"  
के संदेश आ रहे है सुबह से, पर कोई बता नही रहा
 किसकी इंडिपेंडेंस की खुशिया बांट रहे है,
क्योंकि भारत  सिर्फ एक जमीं के टुकड़े से कहीं ज्यादा है।
आजाद भारत के कुछ कायदे भी थे हमारे आइन में,
बिना किसी धार्मिक भेदभाव के नागरिकता थी,
निष्पक्ष न्यायपालिका और जवाबदेह सरकार थी,
आज का भारत नागरिकता के लिये धर्म पूछता है,
न्यायपालिका को आलोचना से चिढ़ है
और न्यायाधीश साहब को सरकार और राज्यसभा से प्रेम।
सरकार की कोई जवाबदेही नही,
सिर्फ मन की बात है,
सवाल जो पुछते है कोई,
वो जेलों में है ...
अखिल गोगोई या डॉक्टर काफिल की तरह।
आजाद भारत हुकूमतों को सच का आईना दिखाते 
गणेश शंकर विद्यार्थी और तिलक सरीखे पत्रकारो से प्रभावित था,
आज के भारत मे 
पत्रकार पक्षकार बन गए है हुक्मरानों के।
आजाद भारत गांधी को राष्ट्रपिता मानता था,
आजकल गांधी को देशद्रोही बोलने वाले संसद में है
भारत की आत्मा इसके गांवो और किसानों में बसती है,
अब  साल में 11000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे है।

क्या वाकई आजाद है हम ?
या गुलाम हो गये है,
किसी की साम्प्रदायिक महत्वाकांक्षाओं के।
सच छुपा रहे है हम अपने ज़मीर से,
या सरकार झुठला रही है हमारे सच को?
फर्जी अन्धे राष्ट्रवाद की आड़ में,
शोषण के सच को दबाया जा रहा है।
पर जैसे कि पाश ने कहा है:
"सच घास है,
-तुम्हारे हर किये धरे पर उग आएगा"


Happy Independence Day!!

Saturday, May 9, 2020


4 रोटी, कुछ पत्थर और ट्रैक के अलावा कुछ दिखा?


थोड़ा गौर से देखेंगे तो एक पूरा तंत्र दिखेगा, जिसने उन मजदूरों को इस ट्रैक पर धकेला है।
ये तंत्र बना है गैरजिम्मेदार सरकार, संवेदनहीन न्यायपालिका और अपनी आत्मा बेच चुके कुछ पत्रकारों से जिन्होंने इन मजदूरों की हर गुहार को दबा दिया।




मात्र 4 घण्टे का वक्त देकर हमारी सरकार ने लोक डाउन की घोषणा कर दी। कोरोना से लड़ने के लिए लोक डाउन जरूरी था, पर 4 करोड़ से ज्यादा प्रवासी मजदूरों वाले हमारे देश के लिए बिना किसी व्यवस्था के सब कुछ अचानक से रोक देना सही था?
अगर सही होता तो हाइवे और रेलवे ट्रैक्स पर हजारों श्रमिक अपने परिवारो साथ जाते न दिखते। 


सरकार की जिम्मेदारी थी कि वो उन श्रमिको को भरोसे में ले, पर सरकार के समय पर निर्णय ना ले पाने का खामियाजा ग़रीब वर्ग भुगत रहा है।



हमारा संविधान कुछ मूलभूत अधिकार देता है इस देश में रहने वाले हर व्यक्ति को, प्रवासी मजदूरों को भी। जब किसी को इन अधिकारों से वंचित रखा जाए तो इन अधिकारों की रक्षा करने का काम न्यायपालिका का है।
अनुच्छेद 21 : जीवन का अधिकार, जिसमे जीविका का अधिकार भी शामिल है, सिर्फ नाम मात्र के जीवन का नही बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार इस देश मे रहने वाले हर व्यक्ति को देता है।
भारत मे 4 करोड़ से ज्यादा प्रवासी कामगार है, लोकडाउन के चलते इनमें से बहोतों की आजीविका रुक गयी, ऐसे में ये जिम्मदारी सरकार की थी कि इन्हें आर्थिक सहायता दे व सुरक्षित घर पहुंचाए। चूंकि सरकार ने प्राथमिकता नही दी, अतः कर्तव्य सुप्रीम कोर्ट का था कि इन मजदूरों के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा करे।

पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
1 अप्रेल: एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई जिसमें मजदूरों के लिए न्यूनतम आय की मांग रखी गयी।
सुप्रीम कोर्ट बेंच ने बड़ी ही संवेदनहीनता से याचिकाकर्ता से ही प्रश्न कर लिया: " जब सरकार खाने की व्यवस्था कर रही है तो आय की क्या जरूरत है "
27 अप्रेल तक आते आते इन मजदूरों के जीवन के अधिकार के सवाल पर हमारे देश के मुख्य न्यायाधीश बोबडे साब ने बड़ी ही बेशर्मी से कह दिया: " अभी ऐसी स्थिति नही है कि अधिकारों को पहले की तरह प्राथमिकता दी जाए ''

अब तो रिटायर्ड जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस ए पी शाह, भी कह चुके है कि सुप्रीम कोर्ट अपने संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा नही कर रहा है।

 किसी मुल्क में न्याय की स्थापना 2 मुख्य चीज़ो पर निर्भर करती है:
न्यायालय की कानूनी वैद्यता 
और
न्यायालय की विश्वसनीयता

कानूनी वैद्यता तो संविधान प्रदान कर देता है, परंतु विश्वसनीयता लोगों के भरोसे से कमानी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट अपने हालिया रवैये से अपने ही लोगों की नजरों में खुद की बरसो से कमाई प्रतिष्ठा गंवा दी है।






15 April 2020 : 
मुम्बई के बांद्रा स्टेशन पर प्रवासी मजदूर इकट्ठा हुए थे, प्रोटेस्ट करने के लिए, घर जाने के लिए सरकार से गुहार करने के लिए,

अर्णब गोस्वामी ने उस दिन
चिल्ला चिल्ला के इन्हें "पेड एक्टर्स" बोला था, 
एक फेक न्यूज चलाई जिसमे इन मजदूरों के इकट्ठे होने को स्टेशन के पास की मस्जिद से जोड़ा था 
अर्णब ने कहा था कि ये लोग यहां "तफरी करने आये है,  जैसे मेले में लोग आते है"



पत्रकारिता का चोगा ओढ़े एक और गिद्ध : सुधीर चौधरी।
जब रेल में इन प्रवासी श्रमिकों से लिये जाने वाले भाड़े के लिए सरकार को प्रश्न पूछे गए तो इन महाशय ने इस प्रकार अपनी फूहड़ सोच का परिचय दिया:




घुटने टेके न्यायपालिका और बिके हुए मीडिया ने सरकार की जवाबदेही का मख़ौल बना कर रख दिया है। औरंगाबाद के रेलवे ट्रैक पर गई 17 जिंदगियों का दोष इसी सिस्टम पर है जिसे हमने पनपने दिया है।

भाषा और बातचीत की गरिमा बिगाड़ रहे अर्णब, सुधीर या ऐसे अनेको नफरत बेचने वालों के प्रति अपनी निजी घृणा को मैं सार्वजनिक मंच पर लिखने से अपने आप को रोकता था। पर अब वे इतना अधिक नीचे गिर चुके है कि समाज के सामूहिक विवेक की निर्ममता से हत्या कर रहे है।  सरकार के हर काम को छाती पीटने वाले फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद से जोड़ कर मर रहे मजदूरों को  "भाड़े के एक्टर्स" बुलाते है ये गिद्ध।

अब मुझे फ़र्क़ नही पड़ता, की कोई मुझे मेरी इस भाषा के लिए मुझे सनकी समझे। रेलवे ट्रैक पर पड़े रोटी के टुकड़े देखकर अब चुप नही रहा जाता। 





Sunday, October 7, 2018

भारत का अपना #MeToo आ गया है ....

धन्यवाद तनुश्री,
पर्दा उठाने के लिए, 
साहस जुटाने के लिए,
जवाब देने के लिए,
और हर एक उस औरत की लड़ाई लड़ने के लिए जो अपने भविष्य को बचाने के लिए इस पुरुष प्रधान समाज के शोषण का शिकार होती आई है। 
भारत का अपना #MeToo देर आया पर दुरुस्त आया। प्रयास पहले भी काफी हुए पर मीडिया की उपेक्षा और समाज के पाखंडी पक्षपाती रवैये के आगे टिक न सके। हर बार की तरह इस बार भी जब एक पीडिता(तनुश्री) ने आवाज उठाई तो मीडिया/समाज ने वही प्रश्न किया : "10 सालों तक कहाँ थी तुम ?"
पर सौभाग्य वश या संयोग वश, तनुश्री के पास इसका जवाब था। उन्होंने समाज के खोखलेपन को आईना दिखाते हुए बता दिया की 10 सालों तक वे यहीं थी, आवाज पहले भी उठाई थी परन्तु आरोपी का वर्चस्व, पीडिता के आत्मसम्मान पर हावी हो गया था। 
तनुश्री की जलाई मशाल को अनेकों पीड़िताएं आगे से आगे सौंपती जा रही है, और ये मशाल न सिर्फ पीड़िताओ को अपना दर्द बयां करने की हिम्मत दे रही है बल्कि 'सदी के महानायक' कहे जाने वाले अमिताभ जैसे लोगो को भी बेनकाब कर रही है। बॉलीवुड से आगे निकल कर ये मशाल अब पत्रकारिता, कॉमेडी, लेखन के क्षेत्रों में से भी भद्दे घिनौने कारनामों को सबके सामने ला रही है। 
हमारे साथ दिक्कत यह है की किसी के निभाये किरदार या बेहतरीन काम से हम उसकी एक इमेज बना लेते है, जिसके चलते जब इन पर आरोप लगते है तो सवाल  हमेशा पीड़ित/पीडिता से पूछे जाते है। 
द वाइरल फीवर, आल इंडिया बक्चोद, फेंटम...ये सब इस ऑनलाइन दौर के बेहतरीनतम प्लेटफॉर्म्स में शुमार है जिन्होंने रंगभेद(racism),लिंगभेद(sexism),जातिवाद(casteism), बॉडी शेमिंग जैसे अनेक संवेदनशील मुद्दों पर लाखों युवाओं को जागरूक किया। पर यह अजीब विडम्बना है की जब इन्ही में से कोई अरुणाभ कुमार, उत्सव चक्रवर्ती या विकास बह्ल निकल कर आता है तो ये भी उसी समाज के जैसा रवैया दिखाते है जिसके खोखलेपन को उजागर कर इन्होने अपना नाम बनाया है। 
समाज की गन्दगी समाज के लोगो को अंदर से ही साफ़ करनी होगी। सरकारे या कोर्ट, ज्यादा से ज्यादा बस अपराधियों को सजा दे सकते है, इन हरकतों के भविष्य में न होने की गारंटी नहीं दे सकते। सरकार यौन उत्पीडन कानून ले कर आई, सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन्स दी पर समाज की ये गंदगी ज्यों की त्यों है। सामजिक बदलाव समाज के अंदर से ही संभव है। 
सलाम है तनुश्री, महिमा कुकरेजा, कंगना रनौत और अनगिनत ऐसी महिलाओं का जो समाज को बेहतर बनाने के लिए इस पुरुष प्रधान समाज को न सिर्फ चुनौती दे रही है, बल्कि इसके खोखलेपन को जगजाहिर भी कर रही है।


there are decades where nothing happens; and there are weeks where decades happen

                                                                                                                                       - Vladimir Lenin

(शायद इन्ही कुछ हफ़्तों में हिंदुस्तान की महिलाएं अपने आत्मसम्मान  और समानता की लड़ाई में वो  सब पाएगी  जिसकी मुराद वे दशकों से करती आयी है )
 #TimesUp 

Sunday, September 16, 2018

The father abuse

Sharing a wonderfully written article which is primarily a father's rant  towards the atrocities by his toddler but covers sarcastically some of the current socio political situations in the country.

https://www.thehindu.com/opinion/columns/bringing-up-wrecking-ball/article24956452.ece

Friday, April 27, 2018

अनुभव by a guest writer


आसिफा ..... इस लडकी की कहानी पढ़ी मन को झकझोर देने वाली और इस सम्बन्ध में हरकोई यही सोचने को मजबूर है की आज मानवता कहाँ खो गयी है ? इसी बारे में विचार करती हुई एक अजीब सी पीड़ा का अनुभव कर रही हूँ.... 
आसिफा निर्भया मुझे लगता है तुम शहीद हुई हो और शायद तुम्हारी शहादत से ये समाज ये देश थोडा जागृत हो जाए जो लम्बे समय से गहरी नींद में सोया है। 
एक सैनिक जब शहीद होता है तो वो अपनी मर्जी से मौत का आलिंगन करता है आखिरी सांस तक मातृभूमि के रक्षार्थ डटा रहता है पर तुम, तुम्हे तो तडपा तडपा कर मारा गया , पल पल मारा गया। तुम जब घर से निकली तो तुम्हे अंदेशा भी नहीं रहा होगा की तुम्हारे साथ कुछ ऐसा होगा . तुम मरना नहीं चाहती थी. पर ....
आज इन सब पर विचार करते हुए अतीत की कुछ बुरी यादो से धूल सी हट रही है . ये यादे आज मुझे बुरी लग रही है पर उस वक्त जब ये सब कुछ मेरे साथ घट रहा था तब मुझे अच्छे बुरे की पहचान नहीं थी। 
एक 6-7 साल की नासमझ लडकी थी जिसे अच्छे बुरे, सही गलत की पहचान नहीं थी, स्कुल के पास एक घर जिसमे गुलाब के फूल थे लेने चली जाती थी, कुछ सहेलियों के साथ, उस घर में रहने वाले 2 लड़के अक्सर डांट कर भगा दिया करते थे। एक दिन जब हम सब फूल लेने गए तो बाकी सहेलियां घर तक आकर वापिस चली गयी, ये कहकर की लड़के डांटेंगे.. और उनकी बात न मानकर मैं फूल लेने घर के अंदर गयी... घर में उस दिन वो दो लड़के नहीं थे, घर में उनके पिता जो उम्र में मेरे दादाजी से थोड़े ही छोटे होंगे , बैठे थे .
मैंने पूछा मैं गुलाब के फूल ले लूँ तो उन्होंने खुद मुझे फूल तोड़कर दिए, मैं खुश हो गयी, एक हाथ में सब फूल थे और दूसरा हाथ उन्होंने मेरा पकड़ा और एक कमरे में ले गए। उन्होंने मुझे जोर से पकड़ा और कहा : “ बेटा जब मन करे , यहाँ से फूल ले जाया करो " , मैंने भी हाँ में गर्दन हिलाई, वो मुस्कराए और मेरे प्राइवेट पार्टस को उन्होंने छुआ . मेरे लिए असहज था और कुछ समझ नहीं पाई, अच्छा नहीं लगा तो मैंने हाथ छुडवाने की कोशिश की और कहा मुझे स्कूल जाना , घंटी बजने वाली है और फूल फेंक कर वहाँ से भाग गयी। 
फिर उन्ही दिनों एक शादी में जाना हुआ, परिवार के साथ . आँगन में बैठे थे तभी किसी औरत ने मुझसे कहा- “ बेटा ऊपर छत से चाट ले आओ मेरे लिए “...... छत पर सिर्फ 3 आदमी ही थे, मैंने पुछा तो उन अंकल ने कोने में बैठे एक डरावने से आदमी से जाकर लेने को बोला, मैं गयी तो उन्होंने मुझे अपनी गोद में बिठा लिया और पुछा “चाट चाहिए... ?” मैंने जब हाँ में गर्दन हिलाई तो मुझे गाल पर सहलाया , और वहीँ छुआ जहां पिछली बार उस अधेड़ उम्र के आदमी ने छुआ था . असहज हुई मैं, गोद से उतरी और इस बार भी वहां से भागकर नीचे आ गयी। 
फिर ऐसी ही हरकत मेरे पड़ोस के एक अंकल ने मेरे साथ की .....
तीन बार मेरे साथ ऐसी घटिया हरकत हुई , बलात्कार नहीं हुआ .....पर .....सही नहीं है ,ये समाज, ये लोग, बहुत घटिया है...
काश मेरे परिवार में किसी ने मुझसे कभी खुल कर बात की होती। 
आज मेरी उम्र 25 साल है, सब जानती हूँ, समझती हूँ .
समाज की गन्दगी को दूर करना होगा, पर समझ नहीं आता कैसे .....?
(शायद अपना अनुभव साझा करने से ही शुरुआत हो जाए....चुप तो इतने सालों से थी, समाज बद से बद्तर होता चला गया, अब आवाज उठाने की कोशिश तो की है ...)

- by one among the many silent victims of harassment 


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कलमक्रांति -
यह अनुभव किसी पाठक ने साझा किया, जो हमारे इस घटिया समाज की नीच नियत को जाहिर कर रहा है , ये बलात्कारी हमारे ही समाज में पनप रहे है और हमारी खामोशी इनकी ऑक्सीजन बनी हुई है। 
किसी बीमारी को मिटाने के लिए उस के बारे में बात करना पहले जरुरी है और अब बात करनी पड़ेगी। यौन उत्पीड़न को हमारे समाज से मिटाने के लिए अब आवाज उठानी पड़ेगी। 
आसिफा का  मंदिर में और गीता का किसी मदरसे में बलात्कार हो गया है , भगवान् या अल्लाह को कुछ करना होता तो अभी तक कर लेते, अब समाज हमें खुद ही बदलना होगा। 


Thursday, April 12, 2018

भारत माँ, निर्भया और आसिफा


"Patriotism is the last refuge of a scoundrel"


"राष्ट्रवाद ही निक्रिष्टों का अंतिम सहारा है"


सेमुएल जॉनसन द्वारा आज से  करीबन  ढाई सौ साल पहले बोले गए ये शब्द जीवंत हो उठे जब भारत माता की जय के नारे लग रहे थे भारत माँ की ही बेटी के बलात्कार के आरोपी को बचाने के लिए। अबिन्द्र नाथ टैगोर ने कभी न कल्पना की होगी कि उनकी बनाई भारत माँ  एक दिन कुछ जाहिलों को बचाने के लिए काम में ली जायेगी।

जो लिखने, पढने में शर्म आ जाए ऐसे अपराध उस आठ साल की बच्ची के साथ कठुआ में  किये गए है,  इंडियन एक्सप्रेस में छपी चार्जशीट पढने के बाद अगर आप की रूह न काँप जाए तो अपने अंदर के इंसान को टटोल कर देख लेना, हो सकता है मर गया हो इस देश की दुर्गति देख कर।  तिरंगा , श्रीराम , हिंदुत्व , भारत माँ , मजहब सब मैदान में आ गए है पर इंसानियत काफी पीछे छूट गयी है।  गिद्धों की तरह उस मासूम की लाश को नोच रही है ये राजनीति अब।  
सरकार के मंत्री आरोपी के समर्थकों से मिलकर चले आते है पर उस मासूम बच्ची के परिवार को सांत्वना देने का वक़्त नहीं निकाल पा रहे है। उत्तरप्रदेश में बेटी का बलात्कार कर दिया गया और पिता की मृत्यु पुलिस हिरासत में हो गयी है , जब की आरोप स्थानीय विधायक पर है।   राजनीति गन्दी हमेशा से थी, अब घिनौनी भी हो गयी है। ये समाज, सरकार, कानून, संविधान सब निरर्थक है, बेकार है अगर ऐसे ही कभी कोई निर्भया तो कोई आसिफा बनती रही। 
अंदर का नौजवान इस सब में वक़्त जाया न कर अपने करियर और इम्तिहानो की तैयारी करने को सोचता है लेकिन मैं किसी का भाई हूँ, बेटा भी हूँ, आसिफा जैसी ही मासूम छोटी छोटी लड़कियां मुझे चाचा मामा या भैया बोलती है, डर लगता है अब...... अपने करियर की चिंता से कहीं ज्यादा उन की हिफाजत का डर है। हमारा रूढ़िवादी पुरुषप्रधान  समाज एक तो पहले ही बेटियों को बाँध के रखे  हुआ था , अब हाल ऐसी ही दरिंदगी का चलता रहा तो कैसे कोई पिता अपनी बेटी को पढ़ने जाने देने का साहस जुटा पायेगा। 

समाज विकृत होने का उलाहना कब तक देंगे, हर बार सरकार लापरवाह और नेता गैरजिम्मेवार बोलकर हम कब तक अपनी बारी न आने की खैर मनाते रहेंगे ?
फिल्मी डायलॉग है पर यहां बोलना जरुरी है: "कोई देश परफेक्ट नहीं होता, उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है"  ये देश एक लोकतंत्र है,लोकतंत्र में सरकारों की जवाबदेही तय करने के नाना तरह के अधिकार जनता के पास होते है, हमारे पास भी है।  अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है आपके पास , मंच सोशल मीडिया देता है भरपूर उपयोग करे। शांतिपूर्वक सम्मलेन और प्रतिवाद का अधिकार भी है , अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएं , अपनी आने वाली पीढ़ी के अधिकारों की सुरक्षा  के लिए आवाज उठाए।  
वर्ना हमारा आज का नपुंसत्व कल किसी और आसिफा की मौत की वजह बनेगा।

"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"
-दिनकर




Monday, September 4, 2017

बापू ,भगवान और भारत

हाथ में लाठी 
और आँखों पे चश्मा लिए 
स्वर्ग में बैठे बापू ने सोचा 
चलो वापस अपने मुल्क घूम के आते है ,
दंगो में जलते हुए जिस घर से विदा ली थी 
उस घर के ताज़ा हाल जान के आते है 
जिद करी भगवान के आगे तो भगवान भी मान गए 
इस लाठी वाले की जिद के आगे अब भगवान भी हार गए 

स्वर्ग से धरती की डायरेक्ट ट्रैन में बैठे बापू ,
मिली फर्स्ट क्लास सीट बिना किसी रंगभेद के 
अपना देश अपनी हुकूमत 
घूमेंगे देखेंगे 
 कैसे है गरीब , बिना किसी मालिक अंग्रेज के 

सोचते सोचते पता ही न चला 
और बापू पहुँच गए हिंदुस्तान की जमी पर 
कश्मीर की उन वादियों में पहुँच कर लगा 
गाडी एक जन्नत से दूसरी में ले आयी है 
शुक्रिया कहा भगवान को 
और सोचा की संघर्ष की वो राते 
अब जाकर रंग लायी है 
भगवान भी मुस्कुरा दिए ऊपर से 
बोले--"अरे बापू 
अभी पूरी पिक्चर थोड़ी न दिखाई है "


आगे बढे गांधी भगवान को इग्नोर कर 
तो एक पत्थर आकर लगा घुटने पर 
सोचा की कोई बदमाश बच्चे होंगे 
देखा गौर से तो दिखा की 
बदमाश तो थे पर बच्चे नहीं 
क्यूंकि बच्चे बैठे है घरों में 
और गलियों में सेना है 
बहकाये हुए कुछ युवक भी है 
जिन्हे हिन्दोस्तान से अलग होना है 
झेलम भी अब सूनी सी हो गयी है 
सरकारें है 
और सरकारों का अफस्पा भी 
लेकिन वादियां अब खुनी सी हो गयी है 
आतंकियों में नेता है 
नेताओं में आतंकी है 
घाटी की हवा में अब 
लहू की बू आती है 
नफरत ऊगली जा रही है वादी में  
जहां कभी गुलशन थे प्यार के 
इस सब पेचीदगी में 
सीधा अगर कुछ बचा है 
तो बस 
कुछ पेड़ है चिनार के। 

घबराये हुए बापू दौड़े स्टेशन की ओर ,
दिल्ली जाने के लिए गाड़ी में बैठे 
अख़बार बेचने एक बच्चा आया बापू की ओर ,
तो ये बात भी दिल पे ले बैठे कि -
आजादी के 70 साल हो गए है 
स्कूल जाने की बजाय बच्चे अख़बार बेच रहे है 
खैर अख़बार ख़रीदा बापू ने 
और सोचा की "छोटू " से चाय भी ले ली जाए 
क्यूँ कि आंदोलन तो अब कर नहीं सकते थे ,
तो चलो बोहनी ही करवा दी जाए। 

खोला अख़बार तो देखा की 
कोर्ट ने किसी बलात्कारी को सजा सुनाई है,
बुरा लगा विक्टिम के लिए पर संतोष भी हुआ सोचकर कि 
जीते आज भी न्याय और सच्चाई है ,
घबरा गए बापू 
जब देखा की अड़तीस (38) लोग मर गए है इसके लिए,
और लाखों है जो सोचते है की ये भगवान है,
फिर सोचा की 
हम तो मूर्तियों में भगवान ढूंढ़ते है ,
ये ढोंगी तो फिर भी इंसान है। 

देश की चिंता में डूबे बापू पहुंचे राजधानी ,
सत्तर साल बाद भी ये जगह लगी जानी पहचानी 
देखा गर्दन उठा के ,
चश्मे को नाक से ऊपर चढ़ा के 
तो एक बैनर पर प्रधानमंत्री थे देश के 
और देश को स्वच्छ रखने के नारे और सन्देश थे ,
देखा गौर से फोटो में तो दिखा वो चश्मा भी 
जिसने कभी इंसान को मजहबों में बाँट कर देखा ही नहीं 
वो चश्मा अब अभियान का लोगो बन गया है ,
पहले दंगे रोकता था अब खुले में शौच रोकता है। 

तभी एक और आदमी आया ,
मुँह से गुटका थूका उसी बैनर के नीचे ,
और बापू की तरफ मुस्कुराया ,
देश की ये हालत जान कर ,
बापू ने वापस भगवान को फ़ोन लगाया-
"भगवान् रिटर्न ट्रैन कहाँ से है ? कितने बजे है ?..... "
एक सांस में इतने सवाल सुनकर 
भगवन भी बोले हस कर-
"पास में ही गाज़ीपुर है ,
वही गाजीपुर जहां कचरे के पहाड़ है ,
बहुत से गरीब रहते है यहां ,सब बीमार है 
यहां पूरे शहर की गन्दगी और कचरे की बू आती है,
इस बस्ती से भी मेरे यहां डायरेक्ट एक ट्रैन आती है ,
गरीबो से भरी है ये ट्रैन ,
थोड़ा जल्दी जाना ,
सुबह तुम्हे धरती की जन्नत में उतारा था,
अभी धरती का नरक भी देखते हुए आना। "

सुनकर बापू चले गाज़ीपुर की ओर,
नरक के रस्ते 
वापस स्वर्ग की ओर 

ट्रैन पकड़ी पहुंचे ऊपर ,
पूछा भगवान् ने -
"बापू कैसा रहा सफर ?"

बोले बापू -
"भगवान ये सही है कि,
मैं अपनी जिद के लिए शर्मिंदा हूँ 
पर मैं आज भी अपने लोगों के दिलों में जिन्दा हूँ "

अब भगवान् ने भी सर पकड़ लिया ,
और गुस्से में बोल दिया -
"बापू तुम ज़िंदा हो तो बस कुछ नोटों में , 
कुछ यादों में और कुछ फोटो में,
कभी दीवारों पे टंगते हो ,
कभी तिजोरियों में सजते हो , 
गोडसे की गोली से तो बस जान गयी थी ,
बाकी उसूलों के हिसाब से तो 
इस देश में तुम हर रोज़ मरते हो"


-कलमक्रान्ति 



Thursday, August 31, 2017

विपक्ष कहाँ है ?

गोरखपुर में नन्हे बच्चे प्रशासन की लापरवाही की बलि चढ़ गए है , हरियाणा में सरकार के सुरक्षा इंतज़ाम आश्वासन के बावजूद 38 लोग भीड़ में छुपे गुंडों के हाथो मारे गए , रेलगाड़ियाँ पटरियों से उतर रही है, दंगे हो रहे है  .........अराजकता तो नहीं है ,सरकारें है हमारे पास ...... लेकिन जवाबदेही कहाँ है..... सवाल पूछने वाला विपक्ष कहाँ है ?
 
लोकतंत्र में सरकार का जितना महत्व है उतना ही विपक्ष का , लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए ही विपक्ष का अस्तित्व है।
हाँ ये सच है संसद में विपक्ष के पास सरकार की किसी नीति को अस्वीकार करने लायक आंकड़े नहीं है , लेकिन संसद एक मंच भी प्रदान करता है देश के नागरिको तक अपनी बात पहुंचाने के लिए , किसी नीति पर सरकार के  समानांतर या विपरीत एक पक्ष रखने के लिए, जाहिर है की विपक्ष अपनी ये जिम्मेदारी भी भूल गया है।
संसद में पक्ष रखने के लिए वहां हाजिर रहना पड़ता है और बीते सालो में सांसदों की संसद में गैरहाजरी तो पहले से ही विचारणीय बिंदु रहा है। अगर संसद में नहीं तो संसद के बाहर ही सही , लेकिन विपक्ष तो वहां भी नहीं है।  संविधान बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार इसलिए  भी  देता है की बिना किसी दबाव के सरकार के काम की प्रशंसा या निंदा की जा सके।  
अगर यही हाल रहा तो डर है की हमारा लोकतंत्र भी एक कागजी लोकतंत्र बनकर रह जाएगा जिसमे सरकारे चुन के तो लोगो में से आएगी पर अपनी गलतियों के लिए  लोगो के प्रति उनकी जवाबदेही कहीं नहीं होगी।  

Friday, January 23, 2015

सियासत फिर जीत गयी, आंदोलन हार गया...

जे पी की तरह अन्ना के भी सभी चेलों का प्लेसमेंट हो गया ( FYI : प्लेसमेंट हमारी इंजीनियरिंग के फर्स्ट ईयर और फोर्थ ईयर में सबसे ज्यादा प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द है ),
ताज़ा प्लेसमेंट किरण बेदी जी का हुआ है। अन्ना के इंडिया अगेंस्ट करप्शन के 2011 बैच के श्रेष्ठतम विद्यार्थियों में से एक किरण जी का अचानक ह्रदय परिवर्तन हुआ, नतीजतन वो अभी भाजपा में प्लेस हुई है   , वैसे अरविन्द , वी के सिंह , विश्वास ,सिसोदिया ,शाजिया जैसे होनहारों का प्लेसमेंट तो काफी पहले हो ही गया था। कोई झाड़ू तो कोई कमल वाली कंपनी में प्लेसमेंट करवा के उम्मीदों के बड़े भारी पैकेज लेकर बैठा है। 
तक़रीबन 40 साल पहले 1974 में जयप्रकाश नारायण (जे पी ) के पूर्ण स्वराज आंदोलन से निकले लालू यादव , नीतीश कुमार ,रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं को सियासत में अपने पैर जमाने में इतना समय लग गया जब कि ट्वेंटी ट्वेंटी के इस दौर जिस फुर्ती से अन्ना के चेलों ने रन बटोरे है उसका अंदाजा तो इसी से लगता है कि राजधानी में चुनाव कोई भी जीते , मुख्यमंत्री अन्ना के ही चेलों में से ही कोई होगा। 
भले ही अरविन्द सबसे ईमानदार नेता हो , भले ही किरण सबसे अच्छी मुख्यमंत्री साबित हो लेकिन जब अरविन्द बोलते है कि हमसे गलती हो गयी , किरण बेदी या शाज़िआ सरीखे लोगो के अचानक हृदय परिवर्तन हो जाते है, सब आपस में आरोप प्रत्यारोप करते है तो बार बार ये ख्याल आता है की एक बार फिर राजनीति जीत गयी ,आंदोलन हार गया। 4 साल पहले जंतर मंतर पर जो उम्मीद जगी थी ,उसकी धज्जिया उड़ती दिखती है।  
अरविन्द , किरण, सिसोदिया या शाज़िआ तो अभी भी सुर्ख़ियों में है , पर अन्ना और उनका लोकपाल सब भूल गए है। सब एक दूसरे के पुराने ट्वीट्स और बयान निकाल कर ला रहे है ,पता नहीं पुराने उसूलों पर कब ध्यान जाएगा। 
खैर जो भी हो , एक बात ये भी है कि दिल्ली के लोगो के पास मुख्यमंत्री के लिए इनसे अच्छे विकल्प नहीं हो सकते थे। 


" सियासत फिर जीत गयी, 
आंदोलन पुनः हार गया, 
कुर्सी का वो  कीड़ा 
उसूलों को डकार गया 
तब जेपी हारा था अब अन्ना हारा है 
राजनीति के इस जंगल में 
आज भी लोकतंत्र ही बेचारा है  "



Tuesday, December 30, 2014

धर्म के ठेकेदार


देश में ये हो क्या रहा है?
लव जिहाद की पागलपन्ति अभी थमी ही थी कि धर्मांतरण व घर वापसी जैसे मुद्दे महंगाई और अर्थव्यवस्था की चर्चाओं पर हावी हो गए।  
जिस आग से आर एस एस , वि एच पि और बजरंग दल खेल रहे है उसके खतरों से शायद वो खुद वाकिफ नहीं है , आज ही के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में खबर छपी है कि यूपी के ढांगर समुदाय के लोगो ने सरकार को ये धमकी दी है कि उन्हें शिड्यूल्ड कास्ट के सर्टिफिकेट जारी किये जाए वर्ना ढांगर समुदाय के 1.2 लाख लोग ईसाई धर्म अपना लेंगे , ये आर एस एस और वी एच पी जैसे हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की ही लगाईं आग का नतीजा है कि कोई भी मुंह उठाकर चला आ रहा और लाखो की तादात में धर्मांतरण की धमकियां दे रहा है। इस देश में जब साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ जैसे लोग संसद में पहुँच गए है तो धर्म के नाम पर ऐसी धमकियां मिलने की ही कमी बाकी रह गयी थी ,जो कि आज ये ढांगर समुदाय पूरी कर रहा है। कल कोई फलाँ जाति आएगी और परसों कोई ढिमका सम्प्रदाय,निजी फायदे और वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की विविधता को यूँ ही हाशिये पर धकेल दिया जाएगा और सेकुलरिज्म की धज्जियाँ उड़ा दी जायेगी । 
बिहार में कुछ सालों पहले धर्म परिवर्तन करके हिन्दू से ईसाई बने लोगो को धमकियां मिल रही है। तोगड़िया बोल रहे है देश को शत प्रतिशत हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे ,बजरंग दल वाले मूवी थिएटर्स में उत्पात मचा रहे है। इन सब को देख कर लग तो यही रहा है कि हिन्दू धर्म की रक्षा का पूरा ठेका इन्ही को मिला है।  
नाथूराम गोडसे को बीजेपी के ही एक सांसद सरेआम देशभक्त बोल रहे है , कुछ सिरफिरे गोडसे की मूर्तियां बना कर बैठे है और मंदिर बनवाने की बात कर रहे  है। कुछ महीने पहले आर एस एस की ही एक पत्रिका में छपे लेख में कहा गया की गोडसे को गांधी की बजाय नेहरू को मार देना चाहिए था। क्या ऐसे बयानों और लेखों को बिना किसी कार्यवाही के नजरअंदाज कर देना गांधी नेहरू जैसे उन तमाम देशभक्तों का अपमान नहीं है जिन्होंने इस देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।  
मेक इन इंडिया ,स्वच्छ भारत अभियान और मन की बात जैसे सरकार के  कदम काबिले तारीफ़ है पर क्या गोडसे , संघ और धर्म के ठेकेदारों पर सरकार कुछ ज्यादा ही मेहरबान नहीं हो रही ? 125 करोड भारतीयों ने मिलकर इस सरकार और प्रधानमन्त्री को चुना है न कि किसी आर एस एस या वी एच पी ने। धर्म के इन ठेकेदारों पर अगर अभी नकेल नहीं कसी गयी तो भविष्य में ये इस देश और सरकार दोनों को ले डूबेंगे---
लम्हों ने खता की है , सदियों ने सजा पाई है। 

Saturday, November 22, 2014

(33 करोड़ )+1

33 करोड भगवान पहले से ही  है, एक और सही।
वही एक जो आजकल अखबारों की हैडलाइन और समाचार चैनलों के प्राइम टाइम का मसाला बना हुआ है , संत रामपाल के नाम से सुर्ख़ियों में छाया हुआ ये तथाकथित परमात्मा  जो महिलाओं और बच्चों को ढाल बना कर 3 दिन तक हरियाणा पुलिस और सरकार के तमाम इंतजामात की धज्जियाँ उडाता रहा ,अब जेल  की सलाखों के पीछे अपने अंदर के भगवान को ढूंढ रहा है। इन महाशय का इरादा तो था 33 करोड़ देवी देवताओं वाली सूची में अपना नाम दर्ज करवाने का ,पर फिलहाल तो इनका नाम नित्यानंद और आसाराम वाली फेहरिस्त की शोभा बढ़ा रहा है। 
67 साल पुरानी आजादी और 64 साल पुराने लोकतंत्र को इस एक इंसान ने कटघरे में ला खड़ा किया है। पूरी शासन व्यवस्था को धत्ता बताते हुए कब  लापरवाही की वजह से नौकरी से निकाला  गया एक इंजीनियर कबीर का अवतार बन गया ,सियासतदानों और चौबीसों घंटे चालु रहने वाले मीडिया को खबर ही नहीं लगी। 21वीं सदी का हिंदुस्तान जो एक तरफ मंगल की सतह पर सफलता पर झंडे गाड़ रहा है ,वहीँ दूसरी ओर रामपाल जैसे स्वघोषित अवतारों की इन हरकतों से शर्मसार है। 
 रामपाल जैसे अवतारों का इतना प्रसिद्ध हो जाना अपने आप में हमारी काबिलियत पर भी एक सवाल है ,हम जो खुद को समाज के पढ़े लिखे तबकों में गिनते है। हम देश की जी डी पी , इकॉनमी , मोदी , राहुल , सेकुलरिज्म जैसी बड़ी बड़ी बातें करने में इतने मशगूल थे कि अपने ही समाज के एक बड़े तबके पर और उसकी जरूरतों पर गौर करने का हम वक्त ही नहीं निकल पाये। इलाज कराने को अस्पताल और खाने को रोटी न मिली तो समाज के इस तबके ने एक जालसाज को भी अपना परमात्मा बना लिया। 
नित्यानंद , रामपाल ,आसाराम जैसे और भी बहुत आएंगे , इसी तरह लोगों की आस्था और धर्म के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे ,इनका धंधा ऐसे ही चलता रहेगा जब तक की हम अपने समाज को न बदले, जरुरत है समाज के उस तबके का विश्वास लोकतंत्र में जगाने की जो विश्व शक्ति बनने का सपना लिए दौड़ते हुए विकासशील हिन्दुस्तान में कहीं पीछे छुड़ता जा रहा है। 

भूखे हो पेट ,नंगे हो बदन तो रामपाल या आसाराम भी भगवान है
हम पत्थरों में  ईश्वर पूजते  है ,ये जालसाज तो फिर भी इंसान है 

Sunday, September 21, 2014

हिंदुस्तानी मुसलमान !!


"हिन्दुस्तान के मुसलमान हिन्दुस्तान के लिए जीयेंगे और हिन्दुस्तान के लिए मरेंगे भी"
                                                                                                                                           -  प्रधानमंत्री
                                                                                       
राजनीति में किसी बयान से ज्यादा बयान की टाइमिंग मायने रखती है और ये तो अपने देश का बच्चा बच्चा जानता है की मौजूदा वक्त में राजनीतिक बयानबाजी की इस कला के सबसे बड़े कलाकार खुद हमारे माननीय प्रधानमंत्री है। प्रधानमंत्री का बयान ऐसे वक्त पर आया है जब सीमा पार से अलकायदा के कीड़े हमारे हिन्दुस्तान में बिल बनाने की फ़िराक़ में है और सीमा के भीतर अपने आप को नेता समझने वाले कुछ जाहिल देश के सेकुलरिज्म को शर्मसार कर रहे है। प्रधानमंत्री का बयान सीमा पार के दुश्मनो और सीमा के भीतर के मूर्खों ,दोनों को एक करार जवाब है और वाकई काबिले तारीफ़ है।  
हमने तो सदा यही कहा था कि हम हिंदुस्तानी हिंदुस्तान के लिए जीयेंगे और मरेंगे आज अगर हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री को हिन्दुस्तानी मुसलमानों को अलग से उल्लेखित करने की नौबत आई है तो इसकी वजह भी खुद प्रधानमंत्री की ही पार्टी के चंद नेता है जो जब भी मुंह खोलते है तो पूरी संसद शर्मिंदा होती है। आदित्यनाथ,साक्षी महाराज जैसे लोगो को देख कर लगता है की चुनाव में चली मोदी लहर में कुछ अनावश्यक तत्व भी लहर के साथ संसद में आ पहुंचे है ,जो आये दिन अपनी मानसिक विकलांगता का परिचय देते हुए अपनी पार्टी और पूरे देश को शर्मसार करते है। 
बीते दिनों आये उपचुनाव के नतीजों से ये तो साफ़ है की लव जिहाद जैसे राजनीतिक हथकंडे और जाति मजहब के नाम पर वोट लेने की राजनीती को ये देश अब नकारना सीख गया है । बलात्कार और उत्पीड़न के मामलों को लव जिहाद का नाम देकर सियासती मुनाफा उठाने की जो कोशिश बीजेपी द्वारा की गयी,वो असल में उल्टी पड़ गयी और इसी के चलते कांग्रेस और सपा को भी सम्भलने का मौका मिल गया।  
दरअसल लव जिहाद जैसी कोई चीज का अस्तित्व ही नहीं है ,तो इस पर कुछ ज्यादा सोचने का कोई तुक भी नहीं  है। इसके अलावा भी देश में और बहुत कुछ हो रहा है जिस पर लिखा जा सकता है। अजीतसिंह का सरकारी बंगले के लिए संघर्ष और बिलावल भुट्टो का कश्मीर पर बयान ,जैसे मुद्दे हंसने हंसाने के लिए काफी है ,लव जिहाद जैसे भोंडे मजाक की जरुरत नहीं है। 
साढ़े सत्रह करोड हिंदुस्तानी मुस्लिमों में से ही किसी एक ने तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपती को कैसे राष्ट्रीय मीडिया के सामने हिंदुस्तानी मुस्लिमों की तरफ से जवाब दिया खुद देखिये----
(अतीत के पिटारे से एक वीडियो -)





Saturday, August 23, 2014

पलायन

एक शख्स जिसकी सोच और विचारों का अनुसरण करता हूँ ने एक बार कहा था पलायन का मतलब है संभावनाओं की तलाश में अपने क्षेत्र से बाहर निकलना , पलायन की इस परिभाषा से काफी हद तक संतुष्ट हूँ पर एक शंका है कि क्या पलायन हर बार अपने उद्देश्यों के साथ सफल होता है ?
ज्यादातर लोग पलायन करते है रोजगार के लिए , पर बड़े बड़े सपने रखने वाले हजारों नौजवान समय से पहले पलायन कर जाते है अच्छी शिक्षा और उज्जवल भविष्य के लिए।
निकलते है मेरे जैसे लोग अपने छोटे शहरों के सरकारी स्कूलों से , इन स्कूल्ज के  नामों में कहीं कोई स्टीफेंस या सेंट पोल्स नहीं आता था पर पढ़ाई करने वाले और कराने वाले यहां भी काफी काबिल दर्जे के होते थे। उन पढ़ाने वालों की ही काबिलियत का नतीजा था की हमें इम्तिहानो में अच्छे नंबर मिले , जिनकी बदोलत बेहतर भविष्य के लिए बिना मांगे ,फ्री में राय बांटने वालों ने हमें अपने शहर से बाहर भेजने के काबिल समझ लिया और दे डाली अपनी राय और आ पहुंचे हम बड़े शहरों के नामी कॉलेजज्  में।
पहले साल में जब आये थे तो इसी डर से कि प्रोफेसर अंग्रेजी में कुछ पूछ न ले , हम पूरा लेक्चर मौन मुद्रा में निकाल देते थे।  आते थे कुछ समाजसेवी किस्म के स्वघोषित महान लोग  हमदर्दी जताते हुए ये  पूछने कि तुम इतने चुप क्यों रहते हो , अब कैसे बताएं की बोलने में भी ये डर लगता है कि तुम में से ही कोई हसी न उड़ा दे , कहीं कोई गंवार न कह दे। शुरू में सोचा करते थे की हमने भी अंग्रेजी में टॉप मारा है पिच्यानवे प्रतिशत से ज्यादा नम्बरों से तो अब तो आगे कोई दिक्कत ही नहीं होगी पर यहाँ तो किसी ने अंग्रेजी के नंबर पूछे नहीं बल्कि ऐसे हिंदी मीडियम के छात्र जो अपने स्कूल में खुद की एक अलग पहचान रखते थे ,यहां किसी से बात तक करने से हिचकिचाते है।  
बंद कमरों में अपने गिने चुने दोस्तों के साथ सबटाइटल के सहारे अंग्रेजी फिल्मे देखने की कोशिश कर रहे इन लड़को का दोष सिर्फ इतना है की ये पिटबुल , एमिनेम या मायली सायरस के बजाय सोनू निगम या उदित नारायण के गाने सुन कर बड़े हुए।
खैर जो भी हो ,उज्जवल भविष्य का सपना लिए चले हिंदी वाले भले ही थोड़ी उपेक्षा का शिकार हुए हो पर इसी बहाने अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकल कर दुनिया जानने का मौका तो मिला। इस न दिखने वाले संघर्ष को जो शायद कभी न कभी मंजिल पर पहुँच ही जाएगा ,को समझती हुई दो पंक्तियाँ जो किसी महान आदमी ने हमारे जैसों के लिए ही लिख दी थी :-

"मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही ,गुमराह तो वो है जो घरों से निकले ही नहीं "



Tuesday, June 10, 2014

कांग्रेस : अर्श से फर्श तक

क्या कांग्रेस ख़त्म होने जा रही है , क्या 128 साल पुरानी कांग्रेस निकल चुकी है अपने पतन की तरफ ?
आजादी के बाद देश को सबसे पहली सरकार देने वाली मौलाना कलाम , चाचा नेहरू और सरदार पटेल की वो कांग्रेस जिसे कभी राजीव गांधी के नेतृत्व में 414 सीटें मिली थी ,आज 44 सीटों के साथ लोकसभा में पहुंची हुई है और इस युवा विकासशील भारत के मन से उतरते हुए नजर आ रही है।
परन्तु कांग्रेस का यह हाल होना लाजमी था , जिस हिसाब से उन्होंने बीते 10 सालों की अपनी हुकूमत में हमें तरह तरह के  भ्रष्टाचार और घोटालों  से परिचित कराया था, ये अंदेशा था कि कांग्रेस इस बार सत्ता में नहीं आ पायेगी पर कांग्रेस के इतने बूरी तरह पिटने की कल्पना तो किसी ने नहीं की होगी। वैसे कांग्रेस के घोटालो और भ्रष्टाचार ने इस देश के मीडिया को सही ढंग से सक्रिय कर दिया वरना टीवी पर समाचार चैनल लगा कर तो दो ही चीज़ें देखी जाती थी : एक सुबह का राशिफल और दूसरा शाम को मौसम समाचार।
ये 2G , CWG , कोल गेट , आदर्श जैसे घोटालो ने सरकार का दामन ऐसा पकड़ा की किसी टाइम पर 400 से ज्यादा सीटें लाने वाली पार्टी को आज महज 44 सीटों से संतोष करना पड़ गया।
आदरणीय मनमोहन सिंह जो नब्बे के दशक में देश के लिए संकटमोचक साबित हुए थे , इस बार प्रधानमन्त्री रहते हुए भी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक अपने पद का उपयोग देश को आगे बढ़ाने के लिए नहीं कर पाये , वजह सबको पता है सत्ता को पूरी तरह से एक परिवार के हाथों की कठपुतली बना देने की कीमत मनमोहन सिंह ने अपनी इज्जत गंवा कर उठाई और कांग्रेस पार्टी ने अपने इतिहास का सबसे घटिया प्रदर्शन देकर।
बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अब वापस उठ पाएगी ,क्या वापस कांग्रेस कोई ऐसा कमाल दिखा पायेगी जैसा इंदिरा ने 1980 के चुनावों में दिखाया था ?
राजनीति में कुछ भी संभव है , हो सकता है कांग्रेस अपनी खोई हुई साख वापस हासिल कर ले , लेकिन इसके लिए जरुरी है परिवारवाद से परें हट कर शीर्ष नेतृत्व में कोई बड़ा परिवर्तन हो ,कोई ऐसा परिवर्तन जो पूरे संगठन में नयी जान फूंक सके,पर अभी ऐसे परिवर्तन की दूर दूर तक कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही है। 

Friday, June 6, 2014

लुटती अस्मत बिलखती इंसानियत

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की करीबन 60 करोड़ की महिला आबादी आज अपनी अस्मत और अस्तित्व  को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है , 
अब किसी की माँ ने सब्जी लाने बाजार जाना तो किसी की बहन ने ट्यूशन जाना छोड़ दिया क्यूंकि अब सुबह के अख़बार से लेकर रात के टीवी सामाचार तक में, कुछ राजनीतिक खबरों को छोड़ दे तो बाकी बचे सभी किसी न किसी औरत की आबरू लूटने की ही कहानी कहते रहते है। 
अब बेटियों को एहतियात से जीने की हिदायते दी जाने लगी है।  अब डर लगता है इन बेटियों को, डर लगता है इन्हे कुछ दरिंदों से , इनका डरना लाजमी भी है क्यूंकि अब द्रौपदी की इज्जत बचाने कोई श्रीकृष्ण नहीं आने वाले है और बलात्कारी अब दुर्योधन से भी गए बीते हो गए है जिनके कदम अब किसी की इज्जत लूट लेने तक ही नहीं रुकते, जब तक उस अभागी के शरीर की एक एक नस हार कर दम न तोड़ दे तबतक ये दरिंदे इंसानियत को बोटी बोटी करते रहते है।
घावों पर मिर्च छिड़कने का काम हमारे नेताजी कर देते है जिनको रेप के बारे में कहना है कि लड़कों से गलतियां हो जातीं है। इन तथाकथित लड़कों की गलतियों की कीमत जिस दिन अपने नेताजी को समझ आजायेगी उस दिन इस दरिंदगी पर कुछ हद तक रोक लग जायेगी। 
कभी दिल्ली तो कभी बदायूं ,कभी दामिनी तो कभी गुड़िया , नाम अलग होते है , चेहरे अलग होते है पर हश्र सबका एक जैसा ही होता है। हम भी उठते है मोमबत्तियां जलाते है ,ट्विटर फेसबुक पर आर आई पी लिखते है और अपनी खुशकिस्मती की खैर मनाते हुए सो जाते है। बदायूं की घटना अपने पूरे  देश के मुंह पर एक तमाचा है जो बार बार यही पूछ रही है कि निर्भया के गुजर जाने के एक साल बाद भी हमने और हमारी सरकारों ने ऐसा क्या किया जो इस देश में और कोई दूसरी दामिनी ना बनने पाये।   

तेरी इज्जत तेरी आबरू , अब तेरे ही गले के फंदे बन गए 
तू मत आना इस जहां में ,यहां अब इन्सान दरिंदे बन गए 

Wednesday, May 14, 2014

बिन आँखों के दुनिया



“परेशानी हालात से नहीं खयालात से होती है”
बिना आँखों के जब ये दुनिया देखी कुछेक पल के लिए तो लगा की वाकई वो खयालात ही है जो बार बार परेशान करते है वरना हालात का रोना तो सभी रोते है
कल एक ब्लाइंड स्कूल में जाना हुआ तो अहसास हुआ कि इक ऐसी दुनिया भी है जहां आँखों के सारे काम कुछ हाथ करते है , उन बच्चों के पास आँखें नहीं थी पर जिन्दगी के प्रति ऐसी सकारात्मकता और ऐसा हौसला इससे पहले कभी न देखा था,
सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए सहारे के रूप में साथ में बनी दीवार जिस पर हाथ रख कर ये बच्चे दौड़ कर ऊपर नीचे आ जा रहे थे ,नन्ही हथेलियों के बार बार इस पर घिसे जाने की वजह से दीवार के उपरी हिस्से का पेंट भी अब उतर चुका था
हालात को दोष देने वाले लोग इन नन्ही हथेलियों पर बनी  किस्मत की रेखाओं को दोष देंगे लेकिन इन बच्चों के गजब के हौसले और आत्मबल का जिक्र करने की जहमत नहीं उठाएंगे |
महज 4-5 घंटों में इन बच्चों के जज्बे का कायल हो गया



दुनिया देखने को आँखें नहीं तो क्या हुआ
जिन्दगी जीने का जज्बा तो बेशुमार है

Monday, April 14, 2014

"The more you talk, the less it will happen."





"The more you talk, the less it will happen."
जहां एक ओर हम महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति कर रहे है वही दूसरी ओर इस समाज का एक घटिया सच ये भी है कि इस देश में हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है और हर 3 मिनट में एक महिला सेक्सुअल हर्रास्मेंट का शिकार होती है | कब तक हम यूँ ही ऐसे गंभीर अपराधों के खिलाफ आवाज़ उठाने से शर्माते रहेंगे ?
हमारी इसी चुप्पी का हर्जाना कभी निर्भया को तो कभी गुडिया भुगतना पड़ता है, ये दरिंदगी तब तक हमारे समाज से नहीं जायेगी जब तक हमारा हलक ,हया के मारे इस के खिलाफ कोई आवाज़ निकालने से कतराता रहेगा ?

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ", स्कूल की दीवारों पर और किताबों में बहुत देखी है ये पंक्तियाँ ,पर आज भी इन्तजार है मुझे उस दिन का जब इन पंक्तियों को अमल में लाने की जहमत ये समाज उठाएगा | 


इस विडियो को देखने के बाद अपने जमीर में झांककर एक बार ये सोच कर जरूर देखिएगा कि क्या अब भी ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर हमारी चुप्पी जायज़ है ?



कुछ करना चाहे तो जमाने के अँधेरे घेर लेते है उसे,
 उसकी तरह कोई जी ले, तो जीना भूल जाए 

Tuesday, April 8, 2014

वाकई राजनीति बदल गयी है !!!

माला पहनाई और रख दिया एक.............
वो सच ही कह रहे थे कि "हम राजनीती करने नहीं , इसे बदलने आये है" वाकई राजनीति तो बदल दी इन्होने वर्ना कभी न देखा था किसी पार्टी के अध्यक्ष को 20 दिनों के अंदर 5 बार भीड़ में थप्पड़ खाते हुए ,या किसी S.H.O. द्वारा राज्य के कानून मंत्री को औकात में रहने की हिदायत देते हुए। हाँ हमने देखा था काशीराम जी को एक पत्रकार पर हाथ उठाते हुए ,हमने देखा था अफसरों को मंत्रियों के जूते साफ़ करते हुए पर पब्लिक से थप्पड़ या जूते खाने का मौका तो नेताजी को जीवन में सिर्फ एक ही बार मिलता था ,चाहे हुड्डा साब हो या चिदम्बरम जी ,मुझे तो याद नहीं कि अरविन्द से पहले किसी भी नेता पर इतने हमले हुए हो।  
चुनावी आचार संहिता लागु होने के दिन ही इतना ज्यादा उपद्रव हुआ था तो प्रचार के दौरान ऐसे थप्पड़ मुक्के चलना स्वाभाविक ही था परन्तु गौर करने लायक बात ये है कि सारे हमले सिर्फ एक ही लीडर पर हुए और वजह दी गयी वादे पूरे न करना,
इस देश के वोटर ऐसे तो कभी नहीं थे ,वर्ना वादों के नाम पर अगर थप्पड़ बरसते तो अपने सारे सांसदों और विधायकों के गालों पर आज अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लोगों की दी हुई निशानियाँ होती। इस सब के पीछे चाहे कोई राजनीतिक साजिश हो या कोई और वजह, पर है तो ये एक तरह कि कायरता ही, जब हमारा संविधान हमें खुद हमारा नेता चुनने का हक़ देता है तो चुनाव से पहले ऐसी हिंसा शर्मनाक है।

ये स्याही ,अंडे और थप्पड़  का कल्चर हमारे हिंदुस्तान का नहीं है,लोकतंत्र को इस तरह की घटिया हरकतों के जरिये शर्मसार न किया जाए। 

Wednesday, April 2, 2014

धुंए में उड़ती जिन्दगी

आज कॉलेज से हॉस्टल आते वक्त पैरों में रहे सड़क पर पड़े कचरे पर नज़र डाली तो अधबुझी सिगरेट और उनके खाली पैकेट्स के अलावा कोई इक्का दुक्का ही अलग कचरा दिखा होगा। गौर से देखा तो पैकेट के ऊपरी भाग में ब्रांड के नाम के बाद शेष बचे दो तिहाई भाग में काले हुए फेंफड़े और गला दिखाया गया था और भविष्य में कैंसर के खतरे से आगाह भी किया गया था , तक़रीबन 6 फुट ऊपर से भी मेरा चश्मा सड़क पर पड़े इस पैकेट पर लिखी कैंसर की चेतावनी दिखा रहा था, पता नहीं इसे इस्तेमाल करने वाले कैसे इसे नजरअंदाज कर देते है।  
कॉलेज में तो टोबैको फ्री कैंपस के बोर्ड लगे है जिनकी प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं है पर कैंपस की चारदीवारी से दो कदम बाहर जो रखे तो अपनी जवानी और भविष्य को सिगरेट के धुंए में उड़ाते हुए वो ब्रांडेड टीशर्ट पहने कानों में इयरफ़ोन डाले 'कूल ड्यूड्स' दिखाई देते है जिनको इस बात का कोई इल्म ही नहीं है कि घर से रोज़ फ़ोन करने वाली उनकी माँ को आज भी ये लगता है कि उसका बेटा  आज भी एल्पेनलिब्बेल खाता है और फ्रूटी पीता  है। 

खैर समाज बदल रहा है, बदलते समाज में जहां एक ओर ये जवान लड़के लडकियां भ्रष्टाचार ,गुंडागर्दी या दहेज़ जैसी रूढ़िवादी परम्पराओं के खिलाफ आवाज उठा रहे है वहीँ एक सच ये भी है कि इनके लिए सिगरेट शराब जैसी चीज़ें फैशन बन गयी है। 

अपने विचारों को व्यक्त करने में अगर यहाँ मैंने किसी व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है तो इसके लिए मुझे कोई खेद नहीं है क्योंकि मैं नहीं समझता कि सिगरेट के कश में अपनी जिंदगी उड़ाना किसी समस्या का समाधान है या किसी तरह का फैशन स्टेटमेंट है।    


अंत में गुलजार साहब की दो पंक्तियाँ
"मैं सिगरेट तो नहीं पीता पर हर आने वाले से ये पूछ लेता हूँ - माचिस है क्या?
मैं सिगरेट तो नहीं पीता पर हर आने वाले से ये पूछ लेता हूँ - माचिस है क्या?
क्यूंकी ऐसा बहुत कुछ है जिसे मैं जला देना चाहता हूँ "

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